आटा तो हर कोई पिसवाता है पर कभी किसी ने अंग्रेजों के जमाने की 200 साल पुरानी चक्की से पिसा हुआ आटा उपयोग किया है। जी हां, आप यह बात सुनकर हैरान जरूर होंगें लेकिन सच में यह चक्की मुगलों और अंग्रेजों के जमाने की है, जिसके बारे में सुनकर आप दंग रह जाओगे। आज हम आपको गाजियाबाद की ऐसी आटे की चक्की के बारे में बताएगें यहां पर चक्की पानी के प्रैशर से चलती है और पानी आता है हरिद्वार की गंगा से।
इस चक्की का नाम है नाहल झाल जो कि गाजियाबाद के डासला में है। यह चक्की 1868 में बनी थी लेक्नि ये अपने फायदे आज भी लोगों को दे रही है। पुराने जमाने का विज्ञान ही कुछ एेसा था न बिजली का कोई झंझट, न कोई खर्चा, न कोई प्रदूषण। इस चक्की का आटा स्वादिष्ट होने के साथ ज्यादा पौष्टिक भी है। क्यों कि जब आटा बिजली की चक्की में पिसता है तो उसके सारे पौष्टिक गुण खत्म हो जाते है।इस चक्की के पिसे आटे की खूबियां का तो कहना ही क्या? इसके आटे की तासीर ठंडी है। इसके पिसे हुए आटे से रोटीयां ज्यादा नर्म बनती है। यह आटा अधिक पानी सोखता है इसलिए आम आटे से अधिक फूलता है। इस आटे की रोटी जल्दी पचती है। यह आटा 8,9 महीने तक खराब नहीं होता। सेहत के लिए इतने अच्छे आटे को खरीदने के लिए लोग दूर-दूर सो यहां आते है। इस चक्की के पिसे आटे की कीमत भी सस्ती है।

Advertisements