मोटे तौर पर देखा जाए तो इस्लाम में बुत परस्ती यानि पत्थर पूजा की मनाही है पर फिर भी मक्का मस्जिद के अंदर लगें “हजारे अस्वद” यानि काले पत्थर को लोग वहां जाकर चूमते हैं और उसका आदर करते हैं तो प्रश्न उठता है की ऐसा आखिर क्यों करते हैं ये लोग तो आज हम आपको प्राचीन अरब के इतिहास में ले जाकर इसकी जानकारी दे रहें हैं, आइये जानते हैं इसके बारे में।

c.png

काला पत्थर, अल्लाह की देन नही –

वर्तमान में सभी इस्लामी यह समझते हैं की यह काला पत्थर अल्लाह की ही देन है तो बहुत से इसको जन्नती पत्थर भी मानते हैं पर असल में ये असल में एक उल्का है जो मुहम्मद साहब के जन्म के कई सौ साल पहले अरब में गिरा था। इतिहास की बात करें तो 600 ई. से पहले यानि इस्लाम से पहले अरब के लोग कुदरत की पूजा करते थे। ये लोग बंजारे हुआ करते थे और इनके हर कबीले का एक कुल देव होता था। मक्का और मदीना उस वक़्त भी अरब के मुख्य शहर थे।

d.jpg

(“इलाह” देवता की मूर्ति )
अरबियो के भी कई देवता थे जिसमे मुख्य था चन्द्र देवता जिसको “इलाह” के नाम से उस समय जाना जाता था। कुरान में ऐसे कबीले वाले लोगों का जिक्र है की ऐसे लोग अंध श्रद्धालु थे ,वे पेड़ो को पूजते थे तो जब वह उल्का मक्का शहर में गिरा तो सब ने उसे चन्द्र देव यानि “इलाह” की देन समझी। ये लोग इस उल्का की पूजा करने लगे ताकि उन्हें बरकत मिले। प्रश्न उठता है की मुहम्मद साहब ने प्राचीन अरब धर्म के सारे के सारे मंदिर तुडवा दिए और बंद करवा दिए तो केवल इसे ही क्यों बक्शा ?

cc.jpg

पत्थर की सचाई –

जैसा आपको हमने बताया की प्राचीन अरबी उस उल्का को चन्द्र देव की देन समझ कर पूजते थे पर प्रश्न यह उठता है की इस्लाम में इसे इतना महत्व क्यों है ?
इसका उत्तर है की मुहम्मद साहब भी एक सौदागर ही थे और वह भी प्राचीन अरबी धर्म को मानते थे। उसके अनेक रिश्तेदार अनेक धर्म का पालन करते।कोई इसाई ,कोई यहूदी। मुहम्मद साहब प्राचीन अरबी धर्म के “इलाह” देवता के भक्त थे। वह मानते थे की केवल “इलाह” ही ईश्वर है और कोई नहीं और यही “इलाह” शब्द बाद में जाकर “अल्लाह” बना और क्युकी वह पत्थर इलाह यानि अल्लाह की देन थी इसलिए इस्लाम में उसे पूजने की इज़ाज़त है।

Advertisements