सोचिए, कड़ाके की ठंड में कोई आप पर ठंडा-ठंडा पानी डाल दे। कैसा लगेगा आपको? शायद आप उस शख्‍स को मारने के लिए ही दौड़ पड़ें, लेकिन एक बुजुर्ग ऐसे भी हैं जो इस हाड़ कंपकंपा देने वाली ठंड में बर्फ की सिल्‍ली पर सोते हैं और बर्फ खाते हैं।

60 वर्षीय संत लाल का शरीर बचपन से ही मौसम के विपरीत चलता है। सर्दियों में इन्‍हें गर्मी लगती है तो गर्मी में सर्दी का अहसास होता है। सर्दियों में बर्फ की सिल्‍ली पर सोने वाला यह शख्‍स गर्मियों में अलाव जलाकर और रजाई लेकर सोता है। गर्मी में अगर रजाई और अलाव न मिले तो बुजुर्ग को नींद नहीं आती और कंपकंपी चढ़ी रहती है और सर्दियों में संतलाल को बिना बर्फ खाए चैन नहीं पड़ता है।

गांव डेरोही अहीर के रहने वाले संतलाल का शरीर ऐसा है जो मौसम के उलट काम करता है। सर्दी के मौसम में जोहड़ या नहर में दिन में कम से कम तीन बार नहाते हैं, घर पर बर्फ की सिल्ली पर सोते और बर्फ ही खाते हैं। इसी तरह अगर इस बुजुर्ग को गर्मी में आग और सर्दी में बर्फ समय पर ना मिले तो समझो शरीर व दिमाग में गड़बड़ शुरू हो जाती है। इनके इसी अलग अंदाज के कारण इलाके के लोग इस बुजुर्ग को ‘मौसम विभाग’ के नाम से पुकारते हैं। संतलाल तब तक बर्फ पर लेटे रहते हैं, जब तक वह पिघल नहीं जाती। इसी बर्फ को खाकर वे सर्दियों में अपनी बैचेनी मिटाने का प्रयास करते हैं।

संतलाल का कहना है कि गर्मी में बहुत सर्दी लगती है। कंबल और रजाई ओढ़ कर बिस्तर में सोना पड़ता है। दिन में 10 बजने के बाद अलाव का सहारा लेना पड़ता है। ज्येष्ठ माह में जब लोग लू से बचने के लिए जहां एसी, कूलर व पंखों का इस्तेमाल करते है। वहां संतलाल को दिन में चलने वाली लू में रहना अमृत मिलने के समान लगता है। संतलाल कहते हैं कि पिछले साठ सालों में वे एक बार भी बीमार नहीं हुए। वे खाने में सादी दाल-रोटी ही खाते हैं। 21 साल की उम्र में उनकी शादी हुई और उनके चार लड़के है। मौसम के विपरीत शरीर की यह हलचल अब संतलाल के अलावा उसके परिजन को भी आम लगने लगी है।

मौसम विभाग के नाम से जाने वाले इस शख्स के शरीर की हलचल के बारे में डिप्टी सीएमओ डॉ. अशोक कुमार का कहना है कि सर्दी और गर्मी का अहसास हमारे दिमाग में स्थित थर्मोरेगुलेटरी प्वाइंट से होता है। इस थर्मोरेगुलेटरी प्वाइंट को थैलेमस व हाईपो थैलेमस कंट्रोल करते है। इससे संबंधित कोई बीमारी होने पर ही मनुष्य को इस तरह का अहसास होता है। वैसे मैंने अपने जीवन में इस तरह का केस नहीं देखा है। मेडिकल कॉलेज स्तर पर यह एक शोध का विषय है।

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