“नज़रों को भा जाए ऐसे नज़ारे बहुत हैं, कोई गर दिल को भी छू जाए तो बात और है”

बड़ी देर से सोच रही हूँ कि इस स्टोरी की शुरुआत कैसे करू पर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मुझे पता है कि मुझे किस बारे में बात करनी है पर मुझे शब्द नहीं मिल पा रहे हैं।क्योकि मैंने अभी जिस मस्जिद की तस्वीरें देखी हैं वो इतनी खूबसूरत हैं, इतनी खूबसूरत है, इतनी खूबसूरत हैं कि उसके लिए यह ‘खूबसूरत’ शब्द भी मामूली सा हैं। मेरे दिमाग में अभी बस एक ही बात घूम रही हैं कि मुझे जल्द से जल्द वहाँ जाना हैं।अगर आपको मेरी बातों का विश्वास नहीं है तो आप खुद ये तस्वीरें देख लें, अगर आप भी कला की क़द्र करते हैं तो यक़ीन मानिए एक पल के लिए तो आपको अपनी आँखों पर ही विश्वास ही नहीं होगा।

 मुस्लिम देश ईरान में यूँ तो कई मस्जिद देखने को मिलेगी। लेकिन यहाँ कि ‘नासिर-अल-मुल्क’ मस्जिद सबसे अनोखी हैं।यह ईरान के महशूर शहर शीराज़ में स्तिथ हैं। कहने को यह मस्जिद 1888 में बनी थी पर आज भी इसका एक एक पत्थर नगीने सा चमकता हैं।
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क्या खासियत हैं मस्जिद की –

बाहर से देखने पर तो यह मस्जिद एक आम मस्जिद की तरह ही नज़र आती हैं। लेकिन इसके अंदर जाते ही आपको बिलकुल जन्नत सा अहसास होगा।इस मस्जिद में कई रंगीन काँच लगाए गए हैं। सुबह-सुबह जब सूरज की किरणे इन काँचों से छनकर आती हैं तो इनका अद्भुत प्रतिबिम्ब ज़मीन पर बिछे पर्शियन कारपेट पर पड़ता हैं और फिर जो नज़ारा देखने को मिलता है वो देखने वाले पर जादू सा कर देता।

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काँच का हैं कमाल –

आपने ऐसी कई इमारतें देखी होंगी जहाँ काँच का काम हो। लेकिन इस मस्जिद में कांच पर जो कारीगरी की गयी हैं वो अद्भुत हैं। ईरान में ही आपको अन्य कई मस्ज़िद में भी कांच पर कारीगरी देखने को मिल जाएगी, लेकिन इस मस्ज़िद की कारीगरी का तो कोई जवाब ही नहीं हैं . यह मस्ज़िद गुलाबी मस्ज़िद के नाम से भी मशहूर हैं। यह इसलिए कि इसकी दीवारों, गुम्बदों और छतो पर जो चित्रकारी की गयी हैं, उसमें गुलाबी रंग का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया हैं। यह चित्रकारी भी इसे जन्नत बनाती हैं। यह मस्ज़िद 1876-1888 के दौरान ईरान के शासक ‘मिर्जा हसन अली नासिर अल हसन’ ने बनवाई थी। मिर्ज़ा ईरान के कंजर वंश के राजा थे। इस मस्ज़िद की लाज़वाब डिजाईन का श्रेय ‘मोहम्मद-हसन-ए-मिमार ‘और ‘मोहम्मद रज़ा’ को जाता हैं। अब आप ही बताइये ऐसी जगह आकर कौन इबादत नही करना चाहेगा। मुझे नहीं लगता इस जगह से ज्यादा सुकून कहीं और मिल पाएगा। सुबह-सुबह सूरज चढ़ने के साथ जब हलकी हलकी किरणे रंग बिरंगे कांच से अंदर आती हैं तो लगता हैं मानो ख़ुदा खुद अपने बन्दे से मुलाकात करने जमीं पर उतर आए हैं।

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