उरी हमले के बाद से पूरी दुनिया ध्यान का हिंदुस्तान पर केंद्रित हो गया है. UN में पाकिस्तान को घेरने के बाद, सिंधु नदी समझौते पर उठती चर्चा की मांग और हाल ही में पाकिस्तान केंद्रित कश्मीर में घुसकर आतंकी कैम्पों का खात्मा. कई लोगों का मानना है कि कहीं ये पाकिस्तान के साथ एक और युद्ध की आहट तो नहीं.

यदि युद्ध हो भी जाता है, तो क्या हम उसके लिए तैयार हैं या यहां भी सिर्फ जुमलेबाज़ी और ख़ामोशी का आलम ही देखने को मिलने वाला है. कुछ ऐसे ही सवालों का जवाब दिया सेना के एक रिटायर्ड अफसर और कारगिल युद्ध में महावीर चक्र से सम्मानित दिगेंद्र सिंह सीकर ने.

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दिगेंद्र ने कहा कि “हम अमन पसंद लोग हैं, हम कोई युद्ध नहीं चाहते और न ही हमारी तरफ से कभी कोई शुरुआत होगी, पर युद्ध शुरू हुआ तो मैं अपनी बटालियन वापिस लौटूंगा और उनसे इस बात की परमिशन लूंगा कि वो एक बार फिर तिरंगे के लिए लड़ने का मौका दें.”

आपको बता दें कि दिगेंद्र, राजपूताना राइफल्स के पूर्व कंमाडो रह चुके हैं.

20 साल आर्मी में अपनी सेवा देने के बाद दिगेंद्र 2005 में रिटायर हुए थे. इससे पहले वो श्रीलंका में ऑपरेशन के दौरान LTTE के 40 आतंकियों को भी मार चुके हैं.

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पिता भी कर चुके हैं देश सेवा

राजस्थान के सीकर डिस्ट्रिक्ट में दिगेंद्र का जन्म एक जाट परिवार में 1969 में हुआ था. उनके पिता 1947 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में देश के लिए लड़ चुके हैं.

कारगिल युद्ध में हीरोज़ का भी मिला साथ

दिगेंद्र को कारगिल युद्ध के हीरो रहे, कप्तान विक्रम बत्रा और मेजर विवेक गुप्ता का साथ भी मिला. मेजर विवेक गुप्ता के आदेश का पालन करते हुए Light Machine Gun के साथ चोटी पर पहुंचे और 11 पाकिस्तानी बंकरों को तहस-नहस कर दिया. कारगिल युद्ध में दिगेंद्र ने अद्भुत साहस का परिचय देते हुए 48 पाकिस्तानी जवानों के साथ ही एक पाकिस्तानी मेजर को मौत के घाट उतारा. आज हम सब अपने घरों में महफूज बैठे हैं, उसके पीछे ऐसे ही जवानों का हाथ है. हम दिगेंद्र के हौसलों को दिल से सलाम करते हैं.

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