बॉर्डर पर बसे लोगों की जान को सालों से बचाती आ रही है महेन्द्र सिंह की यह नावं

खबर गुरुदासपुर से है. आपको बता दें कि गुरुदासपुर पाकिस्तान की सीमा से सटा इलाका है. महेंन्द्र सिंह की उम्र 56 साल है और वो रावी नदी के एक छोर पर बसे लोगों को दूसरे किनारे पर सुरक्षित पहुंचाने का काम करते हैं. ये नाव सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक चलती है. घनिये के बेट गुरुदासपुर जिले का अंतिम गांव हैं. उससे आगे पाकिस्तान की सीमा शुरु हो जाती है.

5,500 किसानों को पहुंचाया है सुरक्षित

जब से सीमा पर तनाव शुरु हुआ है, तब से अब तक महेंन्द्र सिंह 5,500 किसानों को अपनी इस बोट पर सवार कर ला चुके हैं. वो कहते हैं कि, “जब सीमा पर बसे किसानों को खाली करने को कहा जाता है, तो ये उनके लिए बहुत बुरा समय होता है. हमारे पूर्वज 1961 और 1971 के दौरान भी यही काम कर रहे थे. इसके अलावा नदी में बाढ़ आ जाने के दौरान भी लोगों को इधर-उधर लाने का काम भी यही बोट करती है.” गांव में जब भी आपदा या सीमा पर तनाव को लेकर चेतावनी दी जाती है, तो महेंन्द सिंह की ये बोट ही लोगों के लिए एकमात्र सहारा होती है.

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गांव के एक किसान गुरुविंदर सिंह का कहना है कि, “हमें अपने मवेशी पीछे छोड़ कर जाने पड़ते हैं. वो हमारे जीवन की सारी पूंजी हैं.”

इलाके के विधायक सुखविंद्र रंधावा का कहना है कि, “सरकार ने इस इलाके में यातायात संबंधी सुविधाओं पर बिल्कुल ज़ोर नहीं दिया.”

सेना द्वारा बॉर्डर के आस-पास एक बड़ा क्षेत्र बाड़े से घेरा हुआ है. इसके अलावा जो किसान अपने खेतों में काम करने के लिए जाते हैं, उन्हें महेंन्द्र सिंह की इसी बोट का सहारा लेना पड़ता है. पंजाब सरकार ने 780 कैंपों में दवाइयों और खाने की सुविधा उपलब्ध करवाई है. इसके साथ सीमा से सटे हुए इलाकों को 1 करोड़ रुपया इस तरह की व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिए सरकार की ओर से दिया जाता है. फिरोज़पुर और फाज़िल्का की सीमा से सटे कई गांव खाली हो गये हैं. लोगों ने अपना घर छोड़ अपने रिश्तेदारों के घर रहना शुरु कर दिया.

फिरोज़पुर जिले के सोनगढ़ गांव में रहने वाले राम सिंह बताते हैं कि, “मैं अपनी पत्नी और बच्चों को अपने रिश्तेदारों के घर छोड़ आया. मैं कैंप में नहीं रहना चाहता.”

जंग को लेकर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं. किसानों को अपनी फसलों को छोड़ कर जाना पड़ा है. ना जाने सीमा पर बसा ये तनाव कितने लोगों के जीवन में तनाव ले आता है.

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