आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि जीसस (Jesus Christ) या ईसा मसीह हिन्दुस्तान में आए और हिन्दुस्तान में ही उनकी मृत्यु हुई. जी हां, ये वाकई आश्चर्य की बात है. हम हाज़िर हैं कुछ ऐसे तथ्यों के साथ, जो ये सिद्ध करते हैं कि जीसस की मृत्यु सूली पर नहीं हुई और वे भारत में आए.

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जीसस और बौद्ध शिक्षाओं में कमाल की समानता देखने को मिलती है. अहिंसा, प्रेम, त्याग, सेवा और क्षमा हिन्दू-बौध दर्शन के ऐसे मूल तत्व थे, जो समकालीन धर्मों में देखने को नहीं मिलते थे और जिनको ईसा मसीह ने हुबहू अपनी शिक्षाओं में सम्मिलित किया. इससे पता चलता है कि जीसस का भारत से कुछ न कुछ कनेक्शन ज़रूर था.

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ध्यान रहे कि ईसा मसीह से पहले वहां के लोग यहूदी धर्म के पैगम्बर मूसा की शिक्षाओं को मानते थे जिनके अनुसार ईश्वर बड़ा ही क्रोधी, ईर्ष्यालु और कठोर दंड देने वाला है, परन्तु ईसा मसीह ने सिखाया कि ईश्वर प्रेमस्वरुप है और बड़ा ही दयावान है.

सबसे बड़ी बात पवित्र आत्मा की अवधारणा है. समस्त संसार जानता है कि जीवात्मा का सिद्धांत भारतीय दर्शन का हिस्सा है. ईसा से पहले आत्मा की अवधारणा पश्चिम में नहीं थी. ईसा मसीह ने इसे परमेश्वर के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया, जिसे चित्रों में सफ़ेद कबूतर के रूप में दर्शाया जाता है.

अब सवाल उठता है कि जीसस (Jesus Christ) ने इन सबका अध्ययन कब किया? वो इतनी दूर भारत में कैसे आए? अगर उन्होंने ये सब भारतीय दर्शन से सिखा तो किसी को पता क्यों नहीं? Gospels (बाइबिल के कथाकारों) ने इसका कहीं ज़िक्र क्यों नहीं किया? इन सब सवालों का जवाब इस तथ्य में है कि बाइबिल का बहुत बड़ा हिस्सा गायब है. या यूं कहें कि जीसस के 13 से 30 साल की जिंदगी का बाइबिल में कोई जिक्र ही नहीं हैं. इस दौरान उन्होंने क्या किया, वो कहां रहे, किसी को कुछ पता नहीं या फिर धर्म की मौलिकता बनी रहे, इसलिए जानबूझ कर इस हिस्से को छिपाया गया.

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12 वर्ष की आयु में जीसस ने येरुशलम के मंदिर में पुजारियों से विचार विमर्श किया, इस नन्हे बालक की जिज्ञासाओं से पुजारी अचंभित हो गए और जीसस की दिव्यता की बातें पुरे येरुशलम में फ़ैल गई. उनके पिता जोसेफ जान के खतरे के डर से उन्हें येरुशलम छोड़ नाजरथ ले गए और बढ़ई का काम करने लगे.

इसके बाद जीसस का कहीं कोई जिक्र नहीं है. शोधकर्ताओं का मानना है कि जीसस (Jesus Christ) सिल्क मार्ग से भारत आए थे जो चीन, तिब्बत और भारत को पश्चिम से जोड़ने वाला उस समय का एक मुख्य व्यापारिक मार्ग था. जीसस को येरुशलम से भारत तक लगभग 3000 किमी का सफ़र तय करने में लगभग 1 साल का समय लगा होगा.

 

जीसस भारत में लगभग 16 वर्ष तa5.pngक रहे. इस दौरान उन्होंने आज के तिब्बत, और चीन के कुछ स्थानों की भी यात्रा की. भारत में वो जगन्नाथ पुरी व् बनारस में भी गए. सन 1887 ई में रुसी विद्वान नोटोविच ने ये आशंका जाहिर की, जिसमें उन्होंने जीसस के भारत आने की बात कही. नोटोविच (Notowich) कई बार कश्मीर आए और उन्होंने जोजी-ला पास के समीप एक बौधमठ में भिक्षु से मुलाकात की, जिसमें उस भिक्षु ने बोधिसत्व प्राप्त एक संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा (Jesus)था. हैरानी की बात ये थी कि ईसा और जीसस के जीवन में कई समानताएं भी थीं.

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30 वर्ष की आयु में जीसस फिर येरुशलम लौटे, जहां जॉन ‘द बैप्टिस्ट’ से उनकी मुलाकात हुई. फिर तमाम किस्सों का जिक्र तो बाइबिल में है ही कि कैसे उन पर मुकद्दमा चलाया गया और उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया.

शोध करता मानते हैं कि सूली पर चढ़ाए जाने के बाद उनकी म्रत्यु नहीं हुई थी. उन्हें 3 अप्रैल सन 30 को दोपहर में क्रूस पर चढ़ाया गया और सूरज ढलने से कुछ देर पहले ही उतार लिया गया था. उन्होंने सूली पर बहुत कम समय (6 घंटे) गुज़ारा था जबकि सूली पर मृत्यु के लिए अपराधी 4 से 5 दिन तक लटके रहते थे.उन्हें बहुत जल्दी मृत घोषित कर दिया और नीचे उतार लिया गया जबकि वो ज़िन्दा थे. उन्हें मकबरे में ले जाया गया, जहां उनके शिष्यों ने उनका उपचार किया. इसके बाद वे केवल एक बार ईस्टर सन्डे (Easter) को दिखाई दिए और फिर अपनी मां मैरी और कुछ अन्य शिष्यों के साथ मध्यपूर्व से होते हुए दोबारा भारत आ गए और इस घटना के कई सालों बाद तक जीवित रहे.

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उनका देहांत भी भारत में ही हुआ. कश्मीर के श्रीनगर में खानयार मौहल्ले की एक गली के नुक्कड़ पर उनका मकबरा है. यह एक साधारण सी दिखने वाली कश्मीरी ईमारत है जिसे यहां रोज़ाबल (Rozabal) के नाम से जाना जाता है. लोगों का मानना है कि ये यूज़ा असफ़ (Yuza Asaf) की कब्र है. ईरान में यात्रा के दौरान जीसस को यूज़ा असफ़ के नाम से ही जाना जाता था. इस कब्र की खासियत ये है कि इस कब्र का रुख उत्तर-पूर्व की तरफ़ है जबकि इस्लाम में इस तरह कब्र नहीं बनाई जाती. दूसरी बात ये कि कब्र के साथ ही उनके चरण चिन्ह भी एक पत्थर पर उकेरे हुए हैं. जिनको जांचने के बाद पता चला कि ये जीसस के पदचिन्हों से मेल खाते हैं. क्योंकि इन पर पैरों पर कील ठोकने से बने निशान भी मौजूद हैं.

भारत प्रवास के दौरान रास्ते में जीसस की माता मैरी चल बसी. जिनकी कब्र अब पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर में स्थित है. उस स्थान का नाम मुर्री है. संभवतः ये नाम माता मैरी के स्थान के कारण ही पड़ा हो.

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जीसस के भारत आने का एक प्रमाण हिन्दू धर्मग्रन्थ भविष्य पुराण में भी मिलता है जिसमें ज़िक्र है कि उन्होंने कुषाण राजा शालिवाहन से भी मुलाकात की. इस कथा में राजा शालिवाहन की मुलाकात हिमालय क्षेत्र में एक सुनहरी बालों वाले ऋषि से होती है जो अपना नाम ईसा बताता है. वह कहता है कि उसका जन्म एक कुंवारी के गर्भ से हुआ है और वह मलेच्छों का देश छोड़ कर आया है.

इसके अलावा अहमदिया सम्प्रदाय के प्रवर्तक मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने भी 1899 ईस्वी में अपनी किताब “मसीहा हिन्दोस्तान में” में इस बात को सिद्ध किया है कि कश्मीर की रोज़ाबल ईमारत जीसस का ही मकबरा है. उनके अनुसार जीसस ने कश्मीर में करीबन 80 वर्ष गुज़ारे.

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इसी कड़ी में एक तथ्य श्राऊड ऑफ़ टयूरेन से भी जुड़ा है. श्राऊड वह लिनेन का कपड़ा है जिसमें जीसस को सूली से उतारने के बाद लपेट कर मकबरे में रखा गया था. इस पर शरीर की गर्मी से जीसस के चेहरे की हल्की सी आकृति भी उभरी हुई है. जब इसका वैज्ञानिक परीक्षण किया गया तो इसकी कार्बन डेट सही नहीं निकली और इसकी प्रमाणिकता को निरस्त कर दिया गया. जबकि जानकारों का कहना है कि श्राऊड का सैंपल बदल दिया गया था क्यूंकि श्राऊड पर शोधकर्ताओं को ऐसे सबूत मिले थे जिनसे ये सिद्ध होता था कि जीसस सूली से उतरने के बाद भी जिन्दा थे. और ये तथ्य पूरी ईसाइयत को झकझोरने वाला हो सकता था.

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संभवतः इन सब तथ्यों और सबूतों को हमेशा से मिटने की कोशिश की गई है. क्योंकि प्रचलित तथ्य यही है कि जीसस सूली पर मरे, 3 दिन बाद फिर से जिन्दा हो गए और स्वर्ग में चले गये.

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ये आर्टिकल अन्वेक्षकों के शोध को पेश करता है. हम ये नहीं कहते कि ये विचार अंतिम सत्य हैं. इस पर बीबीसी से लेकर भारतीय फिल्म प्रभाग तक ने Documentry बनाई है. उनके लिंक्स अंत में दिए गये हैं.

 

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