उम्र 100 साल, नाम अरुणा मुखर्जी, सपना वृद्धाश्रम बनाने का. मुंह में दांत नहीं है, झुर्रियों से चेहरा ढ़का है, हड्डियां कमज़ोर हैं, इस वक्त कुछ मज़बूत है तो इस महिला के इरादे. अरुणा ढाका में पैदा हुई थीं और बांग्लादेश बनने के बाद से असम में रह रहीं हैं. अरुणा की आंखों में वो सारे दर्द कैद हैं, जो विभाजन के वक्त लोगों ने महसूस किए थे. वो कई दिनों की भूख, अपनों से दूर होने का दर्द. विभाजन के वक्त अरुणा से जितना हो सका, लोगों की मदद की. लोगों को भूखा देख अरुणा पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने अपना सब त्याग दिया. आज 70 साल से अरुणा सिर्फ़ चाय और बिस्कुट के सहारे ज़िन्दा हैं.

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कुछ समय पहले अरुणा जब वृद्धाश्रम की परमिशन लेने नगर निगम गईं, तो मेयर ने पूछा कि इसका संचालन कौन करेगा? तब अरुणा ने कहा कि वो खुद करेंगी. वो इसे अक्टूबर में खोलना चाह रही हैं. इसके अलावा अरुणा अभी चार गैर सरकारी संस्थाएं चला रही हैं, जिसमें लोगों को मुफ्त ट्रेनिंग दी जाती है. इसमें फाइन आर्ट, संगीत, सिलाई-बुनाई, कढ़ाई, पेंटिंग और सॉफ्ट टॉय बनाना सिखाया जाता है.

अरुणा की शादी 20 साल की उम्र में ही हो गई थी, उनके पति Jadulal Mukherjee, गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में रसायन विज्ञान विभाग में थे. कुछ साल पहले उनका निधन हो गया. अरुणा के चार बेटे और एक बेटी थी, तीन बेटों का निधन हो चुका है और एक बेटा और बेटी कनाडा में रहते हैं.

अरुणा ने बीते 31 अगस्त 2016 को अपना 100वां जन्मदिन मनाया है. इस तरह के कार्य के साथ लोगों को ‘इंसानियत के लिए जीने’ का सलीका सिखाना चाहती हैं अरुणा. 

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